Feb23

आंखमें धुआं सा छाया हैं

हमारी हसरतों को इस कदर हमनें मिटाया है, 
बुझाई आग फिर भी आंखमें धुआं सा छाया हैं ।

फकत शमशीर के ही जोर से जीता नहीं जाता, 
कई दुश्मन को तो हमने निगाहों से हराया है ।

उसे बस आसमां मिलने की थोड़ी सी जरूरत है, 
परींदो को किसीने क्या कभी उडनां सिखाया है ?

दिवाने लूट ना जाए उन्हें  शायद इसी डर से 
सितारों ने यहाँ से दूर अपना घर बनाया है ।

अगर हैं जुस्तजू तेरी, यहीं  जन्नत को पानेकी, 
लिपट जा मा के आंचल से वो उसका ही तो साया है ।

ये मुमकिन है हवा भी रुख बदल देगी कभी अपना,
यही तो सोचकर हमने चिरागों को जलाया हैं ।

हिफाजत जिंदगी की आज हमनें सौंप दी ऐसे, 
हमारी खुद की सांसोको ही पहरे पे बिठाया है । 

विपुल मांगरोलिया ( वेदांत ) 15/09/2015

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Posted in વેદાંતની ગઝલો ૨૦૧૫-૧૬
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